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खैरात में तो तेरी मोहब्बत भी मंजूर नहीं

Wednesday, 19 August 2015

[1]
उतारे जो ज़िंदगी,गहराइयों मेँ हम।
महफ़िल मेँ रह के भी,रहे तनहाइयों मेँ हम।
दीवानगी नहीँ तो और क्या कहे..?
इंसान ढूंढते रहे परछाइयों मेँ हम।

[2]
लाखो की हंसी तुम्हारे नाम कर देंगे !
हर खुशी तुम पे कुर्बान कर देंगे ।
आये अगर हमारे प्यार मे कोई कमी तो कह देना।
इस जिन्दगी को आखरी सलाम कह देंगे ।

[3]
ज़माने भर में मिलते हे आशिक कई,
मगर वतन से खूबसूरत कोई सनम नहीं होता,
नोटों में भी लिपट कर, सोने में सिमटकर मरे हे कई,
मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफ़न नहीं ।

[4]
हक़ से दे तो तेरी नफ़रत भी सर आँखों पर..
खैरात में तो तेरी मोहब्बत भी मंजूर नहीं।

[5]
मुझको पढ़ना हो तो मेरी शायरी पढ़ लो..

लफ्ज बेमिसाल न सही,
जज्बात लाजवाब होंगे..!!

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